Thursday, December 29, 2011

बस यूँ ही . .



बस यूँ ही  सोचा किए, कि दूर मुझ्से वो है क्यूँ
दूर मुझ्से हो के भी, मुझ्में इतना वो है क्यूँ 

सामने आए कभी, तो लफ्ज़ कम हुए हैं क्यूँ  
लफ्ज़ जब आए जुबां पे, आँख ख़ुल गई है क्यूँ
  
आईना देखूं कभी, तो अक्स उसका ही है क्यूँ
अक्स का एहसास उसका, इतना क्षणिक ही है क्यूँ
   
जब कभी निकलूँ मैं घर से, साथ मेरे वो है क्यूँ 
साथ मेरे है वो लेकिन, पास मेरे नहीं वो क्यूँ
  
दर बदर दूंढा किए, पर मिल न पाए उससे क्यूँ
मिल न पाए उससे लेकिन, चाह मुझ्में इतनी क्यूँ 
  
हर कलम कि स्याही में, रंग उसका ही है क्यूँ
रंग उसका हर तरफ, पर जग मेरा फीका है क्यूँ
  
हर नई आवाज़ को, उसका समझे दिल ये क्यूँ
सब समझता है ये दिल, पर बने अंजान क्यूँ
  
कहते मुझ्को लोग सब, तू यहाँ बैठा है क्यूँ
बैठा यहाँ मै अब ह़ी हूँ, पर वक़्त रुक गया ये क्यूँ
  
फिर चली आंधी वही, ये शाम आगई है क्यूँ
शाम तो ये वो हि है, पर आँख नम हुई है क्यूँ
  
क्यूँ ये दिल बेचैन है, है भीड़ में तनहा ये क्यूँ
तन्हाई के साथ में, ये दिल जुड़ा इतना है क्यूँ
  
आ गई फिर रात काली, डर मेरा ये कम है क्यूँ
डर मेरा ये कम है लेकिन, सुबहा का ये गम है क्यूँ
  
रात के आगोश में ह़ी,तुम नज़र आते हो क्यूँ
आँख खुलने पर मेरी, तुम चले जाते हो क्यूँ
  
दिल मेरा बैचैन है, समझता तू नहीं है क्यूँ
प्यास दिल कि ये मेरे, बढती रही ता उम्र क्यूँ
  
बस यूँ ही  सोचा किए, कि दूर मुझ्से वो है क्यूँ
दूर मुझ्से हो के भी, मुझ्में इतना वो है क्यूँ 

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